Search This Blog

Sunday, January 3, 2016

इसकदर प्यार में

                                             

इसकदर प्यार में टुटे की
खुदा भूल गये
कोई अपना भी है इस शहर में
ये भूल गये

कश्ती कागज की थी
उसे तो कही डुबना था
दिल भी शीशे का था
उसे भी कही टूटना था
उसकी चाहत ने रूलाया
कि वफा भूल गये

हज़ारो सुरते शामिल है
अंजुमन मे मगर
कौन है दोस्त
या रक़ीब या रशीद यहाँ
कऱीब भी गये
पर्दा हटाना भूल गये

एक आश्याँ हो प्यार का
कोई दस्तक दे दे
ख्वाहिश ख्वाहिश ही रह गयी
कोई एक घर दे दे
दरोदिवार की चाहत में
इतना भटके कि
कहाँ रहते हैं
उस दर का पता भूल गये

अब न वो जिक्र
न तलाश न अफ़सोस कोई
न मुक़द्दर से
किसी बात की शिकायत है
क्योंकि हममे
चलती भी है क्या साँसें
उफ़ ये भूल गये !!

                                              मेरा ब्लॉग ज्वाइन करने के लिए ऊपर सिनरी
के नीचे join this site पर क्लिक करे