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Monday, July 18, 2016

छाई प्यासी घटा

                                     

छाई रहती है प्यासी घटा
जम के जज़्बात मचलते हैं
करीब आकर कभी देखो
कि बादल बरसते हैं
या ये आँखें बरसते हैं

अंदर फिसलन घनेरे हैं
अंधेरे ही अंधेरे हैं
कदम रखना सँभल कर के
दरिया यहीं से निकलते हैं
कि जब-जब दिल तड़पते हैं

तन्हा छोड़ जिस सफ़र पर
चल दिये तुम
कभी सोचा क्या करते हैं
तुम्हारा नाम लिख-लिख कर
कभी दिल से लगाते हैं
कभी अश्कों से मिटाते हैं

वही बारिश का मौसम
आ गया है
पुराने ख़यालात उमड़ते हैं
कि इक छाता में हम और तुम
उधर बादल गरजते थे
इधर दो दिल धड़कते थे

जिसमे भींगकर
अबतक ना उबरे
वो सावन याद करते हैं
निभाई तुमने ना जो उल्फ़त
कभी दिल को जलाते हैं
कभी आँखो से बरसते हैं