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Sunday, July 24, 2016

पवन पिया जा बसे परदेश

                                     

पवन जा के बसे परदेश पिया को
दे आना संदेश

उनसे कहना नयन बिछाये
कब से बैठी दर पे टिकाये
आश ये मेरी टूट ना जाये

पवन जा के बसे परदेश पिया बिन
सुना है जीवन

लिख लिख पाति रोज पठाते
कागज पर लिख हाल बताते
फिर भी वो मुझपे तरस ना खाते

पवन जाके बसे परदेश पिया की वहाँ
लड़ तो नहीं गये नैन

सावन की हरियाली फीके
हरी चुनरिया कंगना बिदियाँ भी तीखे
डँसते हैं झूले नाग सरीखे

पवन जा के बसे परदेश पिया संग बीते
भूला तो ना बैठे वो दिन-रैन

सखियाँ सहेलियाँ मुझको चिढ़ाते
अपने भी ताने दे सताते
धीरज का दामन छुटने को आते

पवन जाके बसे परदेश पिया से कहना
जी ना सकेंगें उनके बिन !!

                                                    
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