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Tuesday, January 12, 2016

वो पहला स्पर्श

वो पहला स्पर्श
उसकी कोमल उँगलियों का
किसी प्रेमी का नहीं,हमदर्द का नहीं
हमउम्र का नहीं,जीवनसाथी का भी नहीं
वो पहला स्पर्श बचपन का
जो लौट आया वो मेरा है
मेरे जीवन की बगियाँ में
जो फूल खिला वो मेरा है
अपने टूटे-फूटे शब्दों से
'माँ' कहकर आवाज देना
उसका चलना,गिरकर संभलना
कहीं छिप जाना,कभी इठलाना
कभी भाग-भाग मुझे सताना
मेरे इस अंतर्मन को
छू लेने वाला मेरा है
एक-एक अदा जो भाव भरी
देख के जिसको खिल जाए मन
उसका नटखटपन,बालापन
उसका भोलापन,बड़बोलापन
उसकी मनोहारी सूरत में
जो अक्स छिपा है,मेरा है
मुझे परेशां करना और ख़ुश होना
उसका हँसना,उसका रोना
कभी मुँह बिचका के रूठ जाना
और बात-बात पे ज़िद्द करना
इन आँखों में बसने वाला
वो'कृष्ण कन्हैया'मेरा है!!!