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Tuesday, January 26, 2016

मत आवाज़ दो मुझे ---

मत आवाज़ दो मुझे
मेरे अरमाँ मिट चुकें हैं
मेरे सपने मर चुकें हैं
अब तकलीफ़ किसी बात से नहीं होती
लें जाओं उन यादों को वापस अपने साथ
और मुझे जीने दो
मत आवाज़ दो मुझे
जिन्दा हूँ ये कहने के लिए
क्या सिर्फ साँसें चलनी काफ़ी है
तुम कहोगे
शुक्र है साँसें तो चल रही है
मैं मुस्कुरा सकती हूँ सबके लिए
मैं समर्पित हूँ सबके लिए
ज़िंदगी को जीना मैंनें सीख लिया है
सिर्फ मैं ही तो ऐसी नहीं
जिसने कुछ खोया है
लाखों एेसे हैं जिसने कुछ पाया हीं नहीं
खुश हूँ,मैंनें पाकर कुछ खोया है
उस वक़्त को यादों में समेटे
भविष्य की राहों पर निकल पड़ी हूँ मैं
मत आवाज़ दो मुझे
छोड़ो नाराज़गी खु़दा से भी कैसी
तक़दीर लिखने वाला भी तो थकता होगा
उसकी भी कुछ इच्छाएँ,अपेक्षाएँ हमसे रहीं होंगीं
कहाँ उतर पायें हम उसकी उम्मीदों पर खड़े
मत आवाज़ दो मुझे !!!