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Monday, February 22, 2016

आई उलहना सुनाने

आई उलहना सुनाने यशोदा माँ को
ब्रज की ग्वालिनियाँ
सुन री यशोदा तेरा ये लल्ला
खाता है माटी
देखो न ज़रा मुँह खुलवा के
कहती  है ग्वालिनियाँ
क्यों रे कन्हैंया तुने खाई क्या माटी
कैसी कमी की थी माखन में लाला तोहे
क्यों माटी खायी ना
मारो न मईया मुझे
ये सारी ग्वालिनयाँ जलती हैं मुझसे ना
क्यों इतना जलती हैं
मैं सब ये जानूँ
चाहती है तू मुझे पीटे और ये मज़ा ले लें
ऐसी हैं ग्वालिनियाँ
गइया की कसम मईया
मैं ना खाया माटी
मुझे बरजोरी खिलाई ये ग्वालिनियाँ
मेरा हाल तो देखो ना
आई उलहना सुनाने यशोदा माँ को
ब्रज की ग्वालिनियाँ
सुन री यशोदा तेरा ये कान्हा
यमुना तट पे बंसिया बजा के छेड़े
और चीर चुराये ना
माखन की सौगंध मईया
मैं नहीं छेड़ा
खुद ही ये ग्वालिनियाँ जबरन
पकड़ाई बंसी,कहतीं बजाओ ना
मैं जब बजाया तो सुधबुध खो बैठी
खिसकी चुनरियाँ तो मेरी क्या गलती इसमे
तुम ही बताओ ना
आई उलहना सुनाने यशोदा माँ को
ब्रज की ग्वालिनियाँ
सुन री यशोदा,तेरा ये लल्ला
माखन चुराता है घर-घर जा जाकर
तू क्यों इसको समझाये ना
गोकुल की सौगंध मईया
मैं ना चुराया
मेरे घर में क्या कमी है जो मैया मेरी
मैं माखन चुराऊँगा
मटकी का मटकी माखन भरा पड़ा है देखो
क्यों मैं चुराऊँगा
ये सारी ग्वालिनियाँ जबरन पकड़ के मुझे
मुँह में माखन लगाई ओ मईया मेरी
मैं झुठ बोलूँ ना
मोहनी सूरत पे टपका जो आँसू तो
फटा कलेजा यशोदा का
वो चिढ़ कर बोली
क्यों जलती है मेरे कान्हा से ग्वालिनियाँ
जरा मुझको बताओ ना
सच ही तो कहता है मेरा सलोना
वो क्यों  माखन चुराऐगा
मटकी का मटकी माखन भरा पड़ा है
वो क्यों बाहर जाऐगा
सारी की सारी झूठ- मूठ का उलहना देकर
चाहती है मैं उसे पीटू और
 वो मजा ले लें
मै एैसी नहीं हूँ माँ
हँसते है कान्हा मैया के भोलेपन पे
देखो यहीं  है *माँ*!!