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Monday, June 13, 2016

कल रात संजोये थे

बहुत देर तक बरसते रहें बादल
वो सारे ख़्वाब भींग गये
जो कल रात संजोये थे
हल्की हल्की बूँदों से
सँजायी थी कुछ लम्हें
वो सारे बिखर गये
जो कल रात पिरोये थे

तक़दीर की लकीरे भी क्या
बेतर्तीब लकीरें हैं
कुछ एक-दुजे से उलझी हैं
और कुछ कटी-छँटी हैं
तदबीर भी सिमटकर
बारिश में रो रही है
सारे एहसास मिट गये
जो कल रात महसूस किये थे

बख्ते नासरा से कुछ अरमान जोड़े बैठे थे
ब चश्मे तर के साथ वो भी बह चले थे
बददुआ किसकी शामिल थी
उसकी इबादत के बाद भी
सारी दुआएँ ज़मीदोज़ हो गई
जो कल रात माँगे थे

बेजा नहीं थी हरक़त
तूफ़ाने आब की भी
सब खुश थे बेइंतिहा
एक बस आँखे नम थी मेरी
वो सारे अल्फ़ाज भींग गये
जो तुमसे कहना चाहते थे

बादे खँजा ज़रा सुन जा
ब नज़रे हिकारत से ना देखा कर
मुतहज्जिर बन गई लेकिन
मुतकस्सिर नहीं हूँ अबतक
मौसिमे बाँरा ने सबकुछ छीना
फिर भी एतबार जिंदा है
जो हर लम्हा संजोये थे !!


बेतर्तीब - क्रमहीन
बख्ते नासरा - अधूरी किस्मत
ब चश्मे तर - भींगी हुई आँखों के साथ
बददुआ - श्राप
ज़मीदोज़ - मिट्टी मे मिल जाना
बेजा - अनुचित
हरकत - चाल
तूफाने आब - पानी का तूफान,सैलाब
अल्फ़ाज - लफ़्ज,शब्द-समूह
बादे खँजा - पतझड़ ऋतु की हवा
ब नज़रे हिकारत - तिरस्कार की दृष्टि से
मुतहज्जिर - पत्थर बन जाना
मुतकस्सिर - टूटा हुआ
मौसिमे बाँरा - बरसात