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Monday, June 6, 2016

हस्रत रही दिल की

हस्रत ही रही दिल की
कभी उनकी वफा पाये
वो आये तो मुस्कराये
वो जाये तो रूठ जाये

आने लगी है खुशबू
अब तो बनावटी फूलों से भी
पहचान कैसे हो महज़
खुशबू से जो बहक जायें

उनके मिलने की गर्मजोशी
और मेरे अंदाज बयां करते
कि ख़ास है एक चेहरा
जो पढ़ के भी ना पढ़ पाये

आँखों मे अश्क देते पराये नहीं
बेशक अपने हैं
फ़र्याद मुस्करा के
किससे किस अंदाज में बतलाये

मुंतज़िर सी निगाहें
तलाशती है शुकून के दो पल
टुटे हुए इस दिल से
किस लख्त़े दर को खटखटाये

अये बादल जरा बरस जा
दिल की बंजर धरती पर
कुछ जज्बात उमड़ आये
कुछ एहसास पनप जायें

                                    
   
हस्रत -इच्छा
मुंतज़िर - इंतज़ार करने वाला
लख़्ते दर - दरवाजे की किवाड़

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