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Friday, July 8, 2016

बाबुल का आँगन

                                  

बाबुल तेरे आँगन में
फिर कुछ शामे गुज़ारने की
ख़ुद में चाहत जगते देखा है
दिल आज भी बच्चा बन जाता है
उसने जब भी तेरी गलियों से
मुझे गुज़रते देखा है

माँ का प्यार आँखों में मचलते
बातों से टपकते देखा है
तुमने कोई एहसास
पनपने ही ना दिया कभी
फिर भी छिप छिप कर तुम्हें
प्यार लुटाते देखा है

चेहरे पर न कोई भाव
न प्यार वाले शब्द
हरवक़्त नियम,शिष्टाचार
कर्तव्य,समर्पण की बातें
सुन सुन पकती रही कुढ़ती रही मैं
सारी नाराज़गी काफूर हो जाती जब
मेरी हर सफलता पे
तुम्हें छाती फुलाते देखा है

माँ मेरी गलतियों पर पर्दा डालती जब
उनपे नाराज़ होते
और मुझे भी सज़ा मिलती
मन तड़प उठता ये सोचकर
कि पापा कितने गंदे है
तुम्हें समझने की कोशिश में
डबडबाई आँखे लिए
ठंड से ठिठुरी सोई होती जब
तेरे अंदर के वात्सल्य को
बिन आहट सिर चुमकर
चादर ओढ़ाते देखा है

कितनी राते तुम्हारी फटकार सुन
नाराजगी मे बिन खाये सोई
याद भी नहीं
माँ मनाती थी मगर
उतनी ही रातें तुम्हें
भूखे चुपचाप सोते देखा है

पिता गुरू, पिता आदर्श
पिता तजुर्बा, पिता अनुभव का खजाना
हर कठिन परिस्थितीयों में
तुम्हें ही मैने मेरा हौसला बढ़ाते देखा है

कभी हमारी छोटी इच्छाओ पे
अपना मन मारते तो कभी
हमारे पेट की आग बुझाने के लिए
तुम्हे पल- पल जलते देखा है

वो कुछ ख़ास पल ज़िंदगी के थे
तेरे आँगन से डोली उठी थी मेरी
वो लम्हा भी तेरी आँखों में
मैं ठीक से पढ ना पाई थी
माँ के आँसुओ से इतनी भीगी कि
बस दूर से धुधंले से तुम नज़र आये थे
कितने लोग तुम्हें सहारा दिये खड़े थे
तब पहली बार मैने बुढ़े बरगद को
कदम लड़खड़ाये देखा है

एक युग बित गये जैसे तुम्हें पहचानने में
तुम्हे अबतक ना कह पाई
कि तुम कितने अच्छे हो
आज भी घऱ के आँगन मे पहुँचते ही
तुम्हारे कुर्ते पर लगी गुलाब की इत्र
तुम्हारे होने का एहसास करा जाती है
आँखों मे नमी होती है
तुम्हारे भी, मेरे भी
खिड़की की तरफ मुँह करके
कितनी बार तुम्हें
हवा के झोंकों में मैने
आँखे सुखाते देखा है !!

                                        
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