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Tuesday, February 16, 2016

उनकी चाहत के मैं काबिल नहीं था

उनकी चाहत के मैं काबिल नहीं था
कैसे कह दूँ कि वफ़ा ही नहीं था
माँगी थी एक अदना- सी चीज़ उसने
छोड़ दो मुझे
गर मोहब्बत है ज़रा- सा
कैसे तोड़ देता उसका मासूम-सा दिल
कह दिया जाओ ख़ुश रह लो ज़रा- सा
क्या करता
था क्या मेरे पास उसे देने के लिए
मोहब्बत ने जहाँ छोड़ा ज़रा-सा
मुफ़्लिसी ने वही तोड़ा ज़रा-सा
यकीं था बहुत मुझको अपनी वफ़ा पे
कहीं राहों में दिख जाऐगी तो
मुस्करा के देखेगी ज़रा- सा
टूटकर बिखर गया उस दिन मेरा दिल
गैर की बाँहो में जब वो
शरमा कर सिमट गई ज़रा- सा
सामने मैं खड़ा था
अज़नबी-सी वो गुज़र गई
जैसे देखा न हो मुझको
ख़्वाबों में भी ज़रा- सा
किस कसूर की सज़ा थी मेरी ये
मोहब्बत की या मासूमियत की
बता जायें  ज़रा- सा
रात काटी मैंने बेचैनियों में
सोचा कह दूँ अलविदा सबको ज़रा-सा
मगर फिर दिल से ये आवाज आई
जिसने जानी न किमत वफ़ा की
उस बेमुरव्वत के नाम कर दूँ
ये जीवन भी क्यों ज़रा- सा
इस ज़िंदगी पे हक़ मेरा कहाँ तक
जिसने पैदा किया,पाला उन्हें मैं
बदले में ज़ख्म क्यों दे दूँ ज़रा-सा
जाकर बहुत रोया मैं माँ के सीने से लगकर
उसने सिर पे जब हाथ रक्खा
सारे ग़म मेरे काफूर हो गये हवा-सा !!

काफूर होना- गायब होना, मुफ़्लिसी- गरीबी
अदना- बहुत छोटा