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Saturday, March 26, 2016

एक अहम् ही नहीं आता कान्हा

एक अहम् ही नहीं आता कान्हा
सोचती हूँ  करूँ तो, किससे करूँ कितना करूँ
किस बात पे इतराऊँ कान्हा
जो भी है, जितना भी है
तुने दिया, सब तेरा है कान्हा
कैसे मैं मेरा कहूँ
सूरत,शीरत,दौलत,शोहरत
जो भी है, जितना भी है
तुने दिया, सब तेरा है कान्हा
क्यों मै मेरा कहूँ
एक अहम् ही नहीं आता कान्हा
सोचती हूँ ,करूँ तो, किससे करूँ कितना करूँ
ये नज़रे जो तेरे दर्शन को
व्याकुल है,ये तेरे है, क्याें मै मेरा कहूँ
इस लब पे जो है नाम तेरा
वो लब भी तो तेरे है
कैसे मै मेरा कहूँ
एक अहम् ही नहीं आता कान्हा
सोचती हूँ ,करूँ तो,किससे करूँ कितना करूँ
सुख-दुख मे,ग़म और खुशी में
हरपल तुम शामिल हो कान्हा
जो सुखद पल  तुमने दिये हैं
वो भी तो बस तेरे हैं कान्हा
कैसे मै मेरा कहूँ
फूलो में पौधों में,गुलिस्ता के हर गुलो में
तुम ही बस दिखते हो कान्हा
किस-किस को अपना कहूँ
चाँद में सूरज में,अाँसमा के नीलेपन में
तुम ही तुम हो,किसपे अपना हक़ रखूँ
एक अहम् ही नहीं आता कान्हा
सोचती हूँ ,करूँ तो किससे करूँ कितना करूँ
हर इंसा में तुम दिखते कान्हा
जलूँ तो, किससे जलूँ, कितना जलूँ
किस बात का अभिमान कान्हा
ये साँसे भी जो चलती है,तुने दी हैं
जबतक है ये तन मे मैं जिन्दा हूँ
तन भी तो ये है मिट्टी का
मिट्टी मे ही मिलेगा
मैं क्यों *मैं*मैं* करूँ
एक अहम् ही नहीं आता कान्हा
सोचती हूँ, करूँ तो,किससे करूँ कितना करूँ !!