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Monday, April 11, 2016

तेरी साँसो में

तेरी साँसो में बसती है राधा कन्हैया
और मेरी साँसों मे तुम
क्यों आंकते हो फिर
अपनी चाहत को ज्यादा कन्हैया
और मेरी चाहत को कम
जैसे मुस्काते हो,मुरलिया बजाते हो
राधा के प्रेम मे तुम
वैसे मैं भी मुस्काती हूँ,घ्यान लगाती हूँ
तेरी छबि देख निर्गुण
क्या अंतर है
तेरे और मेरे तड़प में
इतना बता जाते तुम
राधा की पुकार सुन दौड़े चले आते हो
मेरी हर पुकार पे अनसुन
ये कैसा है न्याय कन्हैया
इतना तो कह जाते तुम
प्रेम की परिभाषा भी तो तुम्ही  हो
क्यों एक के लिये फूल
दुजे के लिये काँटे रखते हो चुन चुन
एक की चाहत पे दिल मोम सा पिघलता है
दुजे के लिये पत्थर बन जाते हो तुम
एक की चाहत मे एेसे खोते हो कि
सुध भी ना लेते हो तुम
कैसे ये कर पाते हो तुम कन्हैया
मुझको भी सीखा दो ये गुण
बचपन से सीखा है मैने बड़ो से
सबसे ज्यादा अपने हो तुम
मगर सबसे ज्यादा दुख भी तो तुम ही देते हो
दिल को चुरा कर सुन
कहाँ जाकर  ढ़ुंढ़े तुम्हें कन्हैया
कहाँ छिप गये हो तुम
प्रेम की दृष्टि एकबार इधर भी तो डालो
मुक्त हो जाये मोह माया बंधन से हम !!!